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नई हलचल

गणतंत्र दिवस

सत्य अहिंसा का पाठ पढाता,हर्षोल्लास भरा गणतंत्र दिवस है।जागो मेरे भारत के सपूतो,सोये देश को नई पहचान बनाना है।नफरत,बुराई बैर मिटा के,विश्व में भारत को उठाना है।कुटिल,दुराचारियों एव पापियो...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Rajendra kumar
भूली-बिसरी यादें
276

गणतंत्र की क्रांति

गणतंत्रदिवसकीआपसबकोढेरोंबधाई! भाईअभयकीदोरचनायेंइसगणतंत्रकेजनोंकोसप्रेमभेंटकीजारहीहैं।hum sab kabeer hain: गणतंत्रकीक्रांतितस्वीरयेबदलनीहैआवाज़करो.हुंकारहै, देशअबआज़ादकरो.मालिकहैंमुख़्...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
बृजेश नीरज
64

The last day mail....

  This post can be considered as sequel of one of my previous post IT Serviceman....this is nothing but a simple last working day mail of an IT serviceman, we have a habit to write a sweet and short good bye mail which includes many thanks and appreciations for the managers( I don't understand why people don't put their real feelings in their last day mail?)....this is real mail and already delivered to all my colleagues including Managers of my previous organization, I thought to share it ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Pritesh Dubey
Pritesh - Cut to Cut
193

अभिव्यक्ति

     कुछ साहित्य के सुधी जन साहित्य की बिखरी कड़ियों को पिरोने का प्रयास कर रहे हैं। उनके प्रयासों के कुछ उदाहरण के रूप में ये तीन लिंक यहां दिए जा रहे हैं।इन्हें देखें और अपने सुझाव दें।1-&nbs...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
बृजेश नीरज
69

कोयला खदान के अँधेरों में

के रविन्द्र की पेंटिंग मेरी कविताओं में     नही दीखते उड़ान भरते पंछी नहीं दीखता शुभ्र-नीला आकाश नही दीखते चमचमाते नक्षत्र नही दीखता अथाह विशाल समुद्र नही दीखता सप्तरंगी इन्द्रधनुष क्...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
anwar suhail
अनवर सुहैल का रचना संसार
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खदान का अँधेरा

 PAINTING BY K. RAVINDRAमेरी कविताओं में नही दीखते उड़ान भरते पंछी नहीं दीखता शुभ्र-नीला आकाश नही दीखते चमचमाते नक्षत्र नही दीखता अथाह विशाल समुद्र नही दीखता सप्तरंगी इन्द्रधनुष क्या ऐसा इसलिए है कि भ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
anwar suhail
गुमशुदा चेहरे / gumshuda-chehre
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लाकर मुझको ये प्यारा तिरंगा दिया !

       काम पप्पा ने कितना  चंगा किया ,लाकर मुझको ये प्यारा तिरंगा  दिया !इस तिरंगे की शान निराली बड़ी ,इसको छत पर फहराने की हसरत चढ़ी ,वानर दल से मैंने  पंगा लिया !जब फहरता है ताली बजता हूँ ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
SHIKHA KAUSHIK
मेरा आपका प्यारा ब्लॉग
120

फहराऊं बुलंदी पे ये ख्वाहिश नहीं रही .

फ़िरदौस इस वतन में फ़रहत नहीं रही ,पुरवाई मुहब्बत की यहाँ अब नहीं रही .नारी का जिस्म रौंद रहे जानवर बनकर ,हैवानियत में कोई कमी अब नहीं रही .  फरियाद करे औरत जीने दो मुझे भी ,इलहाम रुनुमाई को हासि...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
SHALINI KAUSHIK
! कौशल !
53

गाँवों का खोखला उत्थान

विश्वपटल पर हमारे देश की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप मे है. गाँवों को भारत के पैर कहा जाता है. हम गाँवों के बहुआयामी उत्थान के लिए अग्रसर भी हैं चाहे वह सड़कों,नहरों,शिक्षा,स्वास्थ्य कोई भी क...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
vandana
Wings of Fancy
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बसंत के बिखरे पत्ते: लिखने से बनेगी बात...

अगर कोई विचार मन में कौंध रहा है, तो कलम उठाइए...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
बृजेश नीरज
64

भीगी बिल्ली बन्दियाँ, बन्दे बनते शेर -

 बन्दी-बन्दा मिल करें, कारस्तानी ढेर ।भीगी बिल्ली बन्दियाँ, बन्दे बनते शेर । बन्दे बनते शेर, दाग ना कोई धब्बा ।बिन हर्रे फिटकरी, कहाता बन्दा अब्बा ।जाय दशक इक बीत, शेरनी बनती बन्दी ।गीदढ़...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
रविकर
रविकर-पुंज
58

कल्याणी का कोप

Sudheer Maurya 'Sudheer'********************************जसिरापुर औरनसिरापुरदोगावं. इनदोनोंगावंकोविभाजितकरकेबहतीहुईकल्याणीनदी. रातकोजबइनगावोंमेंबसेलोगदिनमेंखेतमेंकियेगएहाड़तोड़मेहनतकीथकानखटियापरलेटकरदूरकतरे...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
सुधीर मौर्य
संजोत (Sanjot)
90

हिमायती कम्युनिष्ट, बने कांग्रेसी ढर्रा-

देवि महाश्वेता नमन, नक्सल को अधिकार ।स्वप्न देखने का मिला, उठा हाथ हथियार ।उठा हाथ हथियार, पेट की खातिर उद्यम ।चीर लाश का पेट, प्लांट कर देते हैं बम ।हिमायती कम्युनिष्ट, बने कांग्रेसी ढर्रा । ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
रविकर
रविकर की कुण्डलियाँ
54

"बारावफात"

ईदमीलादुन्नबी का स्मरणोत्सव मनाने का हुक्म﴿ حكم الاحتفال بذكرى المولد النبوي ﴾बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीममैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।हर प्रकार की हम्द व सना (प्रशंसा और...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
120

वीरान ज़िंदगी

वीरान से हो गई है, मेरी ज़िंदगी सारीदुखों का ये मौसम, खुशियाँ इसमें हारीहर दिन था एक ख़ुशी काहर लम्हा नया सवेराक्यूँ जीवन मे दुखों नेआकर के डाला डेरासावन मे क्यूँ लगे है, पतझड़ के जैसे डा...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Rajeev Sharma
कलम कवि की
53

ये हमसे नहीं होगा...खुशदीप

ये हमसे नहीं होगा...बिल्कुल नहीं होगा...हमने किया और ग़लत हो गया तो क्या होगा...लोग क्या कहेंगे...ये सवाल हम कभी न कभी अपने आप से करते ही रहते हैं?  किसी बड़ी चुनौती को मानने से पहले ही हम हाथ पीछे खी...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
ATUL WAGHMARE
0

धरोहर: अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर

छुट्टी की अर्जी:केवल एक कागज या दस्तावेज ही नहीं....एक भावना है..एक आशा है उम्मीद है...और हक भी है एक धमकी है..बहाना है.... ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
बृजेश नीरज
64

जोधपुर के बारे में बिलकुल अनूठी और दिलचस्प बातों का पिटारा...sawai agra

- दो ब्रेड के बीच में मिर्ची बड़ा दबा कर खाना यहाँ का ख़ास ब्रेकफास्ट माना जाता है.- मिठाई की दुकान पर खड़े खड़े आधा किलो गुलाब जामुन खाते जोधपुर में सहज ही किसी को देखा जा सकता है.- गर्मी से बचाव क...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
  Sawai Singh Rajpurohit
RAJPUROHIT SAMAJ
120

अमर शहीद श्री हरि सिंह राजपुरोहित को सादर नमन और विनम्र श्रधांजलि...सुगना फाउंडेशन

वन्‍य जीवों के प्राणरक्षार्थ अपने प्रणों का बलिदान देने वाला अमर शहीद श्री हरि सिंह राजपुरोहित, झाबरा को सादर नमन और विनम्र श्रधांजलि...सुगना फाउंडेशन - मेघलासिया मदभागवत गीता के श्‍लो...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
  Sawai Singh Rajpurohit
RAJPUROHIT SAMAJ
129

गण और गणराज्य की अवधारणा

वैदिक युग के परवर्ती काल में लोगों की प्रवृत्ति अपने-अपने वर्ग का स्वतंत्र शासन करने की ओर हो चली थी। हमारे इस कथन का दूसरा प्रमाण हिन्दू प्रजातंत्र है। वैदिक युग के आरम्भ में केवल राजाओं के द...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Praveen Gupta
हिन्दू - हिंदी - हिन्दुस्थान - HINDU-HINDI-HINDUSTHAN
125

है मुश्किल में जान, बयानी जान-बूझकर -

शिंदे फंदे में फंसे, नाखुश हाइ-कमान |निकला-तीर कमान से, है मुश्किल में जान |है मुश्किल में जान, बयानी जान-बूझकर |कई मर्तबा झूठ, करे गुल बिजली रविकर |करते रहते बीट, विदेशी ढीठ परिंदे | लगता वो तो मीठ, ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
रविकर
रविकर की कुण्डलियाँ
54

सामाजिक स्थिति और चिंतन - 2

आज ....हमेशा कल हो जाता है - जो बीत जाता है बीता कल लौटता नहीं - आनेवाला कल आता नहीं आज की उठापटक में परिभाषाएं बदल जाती हैं पर परम्परा बोलती है खंडहरों से भी अपना वजूद बतलाती है समझाती है ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Ravindra Prabhat
परिकल्पना
62

"उत्तर-अमर भारती-पहेली:102" (श्रीमती अमर भारती)

अमर भारती साप्ताहिक पहेली-102का सही उत्तर है!बौद्ध मन्दिर, देहरादून (उत्तराखण्ड)डॉ.सिद्धेश्वर सिंह जी ने सबसे पहेली का पहले सही उत्तर दिया,और आज की पहेली के विजेता रहे!आपके प्रतिभाग करने के ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
8

सपनो का मर जाना

मंजिल मिलती है, उससे पहले,मिलते पथ पथरीले, शूल  नुकीले.पतझड़, सावन फिर बसंत सुहाना ,सबसे बुरा होता है सपनो का मर जाना.जीवन में कुछ हासिल होता है,हासिल होना कुछ बाकी होता है.मत्वपूर्ण है, गिरते ऊ...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
KAVYASUDHA (काव्य सुधा)
KAVYA SUDHA (काव्य सुधा)
59
Copy & Pest
119

I love you... virtually ! ;-)

I Love You !कितना आसान सा लगता है आज कल ये शब्द किसी से कहना, है न ?नहीं?क्यों?यार एक बार कह के तो देखो किसी को, अगर एक्सेप्ट कर लिया तो फिर बहुत आसान सा लगने लगेगा। यार मालूम है कि मैं जो कह रहा हूँ वो तुमक...  और पढ़ें
6 वर्ष पूर्व
Mahesh Barmate
Kuchh Dil Se...
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