ग़ज़लगंगा.dg की पोस्ट्स

हरेक शाह के अंदर कोई फकीर भी था.

नज़र के सामने ऐसा कोई  नज़ीर  भी  था.हरेक शाह के अंदर कोई फकीर भी था.वो अपने आप में रांझा ही नहीं हीर भी था.बहुत ज़हीन था लेकिन जरा शरीर भी था.किसे बचाते किसे मारकर निकल जातेहमारे सामने प्याद...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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कितनी नफरत फैलानी है, बोलोगे?

मन की मैल हवा में कितना घोलोगे?कितनी नफरत फैलानी है, बोलोगे?सोचो सड़कों पर कितना कोहराम मचेगातुम तो चादर तान के घर में सो लोगे.तेरी झोली और तिजोरी भर जाएगीएक-एक कर जब हर नाव डुबो लोगे.हमें पता ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे

कहां आवाज़ देनी थी, कहां दस्तक लगा बैठे.चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे.मिला मौका तो वो ज़न्नत को भी दोज़ख बना बैठे.जिन्हें सूरज उगाना था, दीया तक को बुझा बैठे.अलमदारों की बस्ती में लगी थी ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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कत्त्आ

जिसे ज़न्नत बनाना था उसे दोजख़ बना बैठे.चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे.ख़ुदा जाने ये कोई हादसा था या कि नादानीजहां सूरज उगाना था, दीया तक को बुझा बैठे।-देवेंद्र गौतम...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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चार तिनकों का आशियाना हुआ

चार तिनकों का आशियाना हुआ,आंधियों में मेरा ठिकाना हुआ।जिसको देखे बिना करार न था,उसको देखे हुए जमाना हुआ।मरना जीना तो इस जमाने मेंं,मिलने-जुलने का इक बहाना हुआ।हर कदम मुश्किलों भरा यारबकिस मु...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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ग़म की धूप न खाओगे तो खुशियों की बरसात न होगी

ग़म की धूप न खाओगे तो खुशियों की बरसात न होगी.दिन की कीमत क्या समझोगे जबतक काली रात न होगी.जीवन के इक मोड़ पे आकर हम फिर से मिल जाएं भी तोलब थिरकेंगे, दिल मचलेगा, पर आपस में बात न होगी.पूरी बस्ती सन...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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रह गए सारे कलंदर इक तरफ

वक्त के सारे सिकंदर इक तरफ.इक तरफ सहरा, समंदर इक तरफ.इक तरफ तदबीर की बाजीगरीऔर इंसां का मुकद्दर इक तरफ.आस्मां को छू लिया इक शख्स नेरह गए सारे कलंदर  इक तरफ.इक तरफ लंबे लिफाफों का सफरपांव से छोट...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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सर पटककर रह गए दीवार में.

जो यकीं रखते नहीं घरबार में.उनकी बातें किसलिए बेकार में.दर खुला, न कोई खिड़की ही खुलीसर पटककर रह गए दीवार में.बस्तियां सूनी नज़र आने लगींआदमी गुम हो गया बाजार में.पांव ने जिस दिन जमीं को छू लिया...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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बस मियां की दौड़ मस्जिद तक न हो.

चाल वो चलिए किसी को शक न हो.बस मियां की दौड़ मस्जिद तक न हो.सल्तनत आराम से चलती नहींसरफिरा जबतक कोई शासक न हो.सांस लेने की इजाजत हो, भलेज़िंदगी पर हर किसी का हक न हो.खुश्क फूलों की अदावत के लिएएक प...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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दोनों तरफ के लोग हैं जिद पर अड़े हुए

हम उनकी उंगलियों में थे कब से पड़े हुए.कागज में दर्ज हो गए तो आंकड़े हुए.ऊंची इमारतों में कहीं दफ्न हो गईंवो गलियां जिनमें खेलके हम तुम बड़े हुए.मुस्किल है कोई बीच का रस्ता निकल सकेदोनों तरफ के ...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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चुप लगा जाना अलग है, बेजु़बानी और है.

दास्तां उनकी अलग, मेरी कहानी और हैमैं तो दरिया हूं मेरे अंदर रवानी और है.कौन समझेगा हमारी कैफ़ि‍यत अबके बरसकह रही है कुछ ज़बां लेकिन कहानी और है.वो अगर गूंगा नहीं होगा तो बोलेगा ज़रूरचुप लगा जा...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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उम्रभर की यही कमाई है.

हर घड़ी ग़म से आशनाई है.ज़िंदगी फिर भी रास आई है.आस्मां तक पहुंच नहीं लेकिनकुछ सितारों से आशनाई है.अपने दुख-दर्द बांटता कैसेउम्रभर की यही कमाई है.ख्वाब में भी नज़र नहीं आतानींद जिसने मेरी चुरा...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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लोकसभा टीवी पर मेरा इंटरव्यू

https://www.youtube.com/watch?v=qxhwTDI1lZQ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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हम कहां हैं, हमें पता तो चले.

और कुछ दूर काफिला तो चले.हम कहां हैं, हमें पता तो चले.हमसफर की तलब नहीं हमकोसाथ कदमों के रास्ता तो चले.बंद कमरे में दम निकलता हैइक जरा सांस भर हवा तो चले.हर हकीक़त बयान कर देंगेआज बातों का सिलसिल...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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हर कोई भागता मिला है मुझे

अपनी रफ़्तार दे गया है मुझेजब कोई रहनुमा मिला है मुझेवक़्त के साथ इस ज़माने मेंहर कोई भागता मिला है मुझेउससे मिलने का या बिछड़ने काकोई शिकवा न अब गिला है मुझेतजरबे हैं जो खींच लाते हैंवर्ना अब कौ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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मैं थककर अगर तेरी बाहों में आऊं.

फुगाओं से निकलूं तो आहों में आऊं.कदम-दर-कदम बेपनाहों में आऊं.मैं चेहरों के जंगल में खोया हुआ हूंमैं कैसे तुम्हारी निगाहों में आऊं.कभी मैं अंधेरों की बाहें टटोलूंकभी रौशनी की पनाहों में आऊं.मै...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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फिर इतिहास भुला बैठे.

(जेएनयू प्रकरण पर)तिल का ताड़ बना बैठे.कैसी आग लगा बैठे.वही खता दुहरा बैठे.फिर इतिहास भुला बैठे.फर्क दोस्त और दुश्मन काकैसे आप भुला बैठे.पुरखों के दामन में वोगहरा दाग लगा बैठे.सबका हवन कराने मे...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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धूप जैसे चांदनी रातों में हो घुलती हुई सी.

  उलझनों की धुंद सबके ज़ेहन में फैली हुई सी.वक़्त की गहराइयों में ज़िंदगी उतरी हुई सी.हर कोई अपनी हवस की आग में जलता हुआ साऔर कुछ इंसानियत की रूह भी भटकी हुई सी.आपकी यादें फज़ा में यूं हरारत भर ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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इस सफर में मेरे पीछे इक सदी रह जाएगी.

रहगुजर पे रहबरों की रहबरी रह जाएगी.ज़िंदगी फिर ज़िंदगी को ढूंढती रह जाएगी.मैं चला जाउंगा अपनी प्यास होठों पर लिएमुद्दतों दरिया में लेकिन खलबली रह जाएगी.रौशनी की बारिशें हर सम्त से होंगी मगरम...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.

आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.और तबीयत भी मेरी आज रवानी में नहीं.काफिला उम्र का समझो कि रवानी में नहीं.कुछ हसीं ख्वाब अगर चश्मे-जवानी में नहीं.खुश्क होने लगे चाहत के सजीले पौधेऔर खुशब...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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हमको जिसका मलाल था क्या था

कोई सुर था न ताल था क्या थाबेख़ुदी का धमाल था क्या थाख्वाब था या खयाल था क्या थाहमको जिसका मलाल था क्या थातुमने पत्थर कहा, खुदा हमनेअपना-अपना ख़याल था क्या थाआग भड़की तो किस तरह भड़कीजेहनो-दिल म...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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मन की गहराई का अंदाजा न था.

मन की गहराई का अंदाजा न था.डूबकर रह जायेंगे, सोचा न था.कितने दरवाज़े थे, कितनी खिड़कियांआपने घर ही मेरा देखा न था                                                    एक दुल्हन की ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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आप परछाईं से लड़ते ही नहीं.

मसअ़ले अपने सुलझते ही नहीं.पेंच इतने हैं कि खुलते ही नहीं.हम कसीदे पर कसीदे पढ़ रहे हैंआप पत्थर हैं पिघलते ही नहीं.लोग आंखों की जबां पढ़ने लगे हैंकोई बहकाये बहकते ही नहीं.बात कड़वी है, मगर सच है...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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न काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार की

न नौसबा की बात है, न ये किसी बयार कीये दास्तान है नजर पे रौशनी के वार कीकिसी को चैन ही नहीं ये क्या अजीब दौर हैतमाम लोग लड़ रहे हैं जंग जीत-हार कीन मंजिलों की जुस्तजू, न हमसफर की आरजून काफिलों की च...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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खुश्क पत्तों सा बिखर जाना है

हर तलातुम से गुज़र जाना हैदिल के दरिया में उतर जाना हैज़िंदा रहना है कि मर जाना है‘आज हर हद से गुज़र जाना है’मौत की यार हक़ीक़त है यहीबस ये अहसास का मर जाना हैपेड़ से टूट गए हैं जैसेखुश्क पत्तों सा बि...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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ज़िंदगी मेरा बुरा चाहती है

और जीने की रज़ा चाहती हैज़िंदगी मेरा बुरा चाहती हैआंधियों से न बचाये जायेंजिन चराग़ों को हवा चाहती हैसर झुकाये तो खड़ा है हर पेड़और क्या बादे-सबा चाहती हैबंद कमरे की उमस किस दरजाहर झरोखे की ह...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

जो अपना नाम किसी फन में कर गए रौशन.उन्हीं के नक्शे-कदम पर हैं काफिले रौशन.ये कैसे दौर से यारब, गुजर रहे हैं हमन आज चेहरों पे रौनक न आइने रौशन.किसी वरक़ पे हमें कुछ नजऱ न आएगाकिताबे-वक्त में जब हों...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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