ख़ुदा के वास्‍ते ! की पोस्ट्स

राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर

राम तुम्‍हारे जन्‍मदिन पर बस वो ही कहना हैजो अनकहा रह जाए और अनकहा कह जाएसुनो राम! सिया, शबरी, अहिल्‍या, सब तुम्‍हारी बाट जोहती हैंआज भी ये सब कण कण में राम खोजती हैं।गीध व्‍याध वानर को अब कौन गल...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
ख़ुदा के वास्‍ते !
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'वेबलेंथ'का खेल

भावों के विशाल पर्वत पर, उगतीखिलती आकाश बेल चढ़ती-कुछ हकीकतें और कुछ आस्‍था,का मेल होती है मित्रता।तय परिधियों के अरण्‍य मेंब्रह्म कमल सी एक बार खिलतीमन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल ह...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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यूं आसमां न ताक...

यूं आसमां न ताक, ना नाप किसी परवाज कोकुछ परिंदे जमीं पर भी हैं, जो अपनी आंखों में,तेरी नज़र का आसमां सजाए बैठे हैं,महसूस किया है कभी तुमने,उस एक अनहद आसमां का ताप... जो सतरंगी सा सुलग रहा है- इनके पर...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
ख़ुदा के वास्‍ते !
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कविता- ये गरल तुम्‍हें पीना होगा

सृष्‍टि की खातिर शिव ने तब एक हलाहल पीया था,अब एक हलाहल तुमको भी इसी तरह पीना होगा,समरस सब होता जाए, निज और द्विज में फर्क मिटे,आग्रह से अनाग्रह सब इसी तरह एक शून्‍य बनें ,जीवन के अविरल तट तक पहुं...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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कृष्णा सोबती के जन्‍मदिन पर उनकी लिखी कहानी- दादी अम्मा

हिन्दी की फिक्शन एवं निबन्ध लेखिका कृष्णा सोबती का आज १८ फ़रवरी को जन्‍मदिन है, वे इसी दिन १९२५ को गुजरात (अब पाकिस्तान में) जन्‍मी थीं। वे अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जा...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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वैक्‍यूम...

मैं कहती हूं कि-आकाश से धरती तक फैला वैक्‍यूम... खींचता है मुझे...उस तत्‍व की ओर,जो विलीन कर देता हैसारा अस्‍तित्‍व सारी सोचसारा अपने-पराये का स्‍पंदनसुख-दुख, राग-द्वेष, प्रेम-विरह,और मैं स्‍वयं ह...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
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व्यवहारिक संशोधनों का----- समय है ये

व्यवहारिक संशोधनों का----- समय है ये बदलते इस समय में रिश्तों की बुनियादें और उनमें प्रेम ,ढूढ़ रहे हैं - गढ़ रहे हैं नित नई परिभाषाएं अपनी .... प्रेम में भी व्यवहार बदल रहे हैं ये व्यवहारिक संशोधनो...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
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राष्ट्रीय ख्याति के अंबिका प्रसाद दिव्‍य पुरस्कारों हेतु पुस्तकें आमंत्रित

भोपाल। साहित्य सदन भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के उन्नीसवे अंबिका प्रसाद दिव्‍य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं । उपन्यास, कहानी...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
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जैनेंद्र कुमार की प्रसिद्ध कहानी- एक रात

जैनेन्द्र कुमारकी प्रसिद्ध कहानी- एक रातप्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्रकुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८) का विशिष्ट स्थान है। हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक पर...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
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बेटियां - दो कवितायें

       1. मेरी बेटियांमेरी बेटियां   मेरा जुनून हैं,ये मेरे मन में नाचते हर्फ हैं जो मुझे ताकत बख्शते हैंजो फरिश्ते हैं दोनों वो मेरी बेटियां हैं देखो उनके नन्हें पैरों की आवाज आज भी ...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
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प्रेमचंद की पुण्यति‍थ‍ि पर उनकी कहानी: पूस की रात

आज मशहूर कथाकार प्रेमचंद की पुण्यति‍थ‍ि है। इस अवसर पर आप भी पढि़ए उनकी प्रसिद्ध कहानी पूस की रात। कथा सम्राट प्रेमचंद ने हिन्‍दी के खजाने में कई अनमोल रत्‍न जोड़े हैं. महज आठ साल की उम्र म...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
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वहां- उस गांव में, कौन रहता है अब...?

वहां-  उस गांव में, कौन रहता है अब...?जहां सुबह तुलसी चौरे पर दिया बालतीजोर जोर से घंटियां हिलाती अम्मा से हम, सुबह अंधेरे ही उठा देने के गुस्से में,कहते अम्मा बस करो, हम जाग गए हैं,अम्मा आरती गाती...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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भागा हुआ है खुदा

(1)मंदिर के अंधेरे कोने में जो फूलों से दबा बैठा है एक खुदा खौफ का मारा हुआ है आजकलइत्र चंदन से नहाने का शौक जब से लगा उसेगांव- मि‍ट्टी की खुश्बू से भागा हुआ है आजकलखेतों को जाती, कांख में दबी रोटी ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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राजस्थान पत्र‍िका के रविवार 12.04.2015 में प्रकाश‍ित मेरी कहानी - पगले का दान

राजस्थान पत्र‍िका के रविवार 12.04.2015 में प्रकाश‍ित मेरी कहानी - पगले का दान । पूरी कहानी पढ़पे के लिये कृपया लिंक पर क्लिक करें....  http://epaper.patrika.com/478049/Rajasthan-Patrika-Jaipur/12-04-2015#page/28/2...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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रेडलाइट वाली औरतें

उस बस्ती की औरतें हैं या ये निशाचरों की है दुनिया , वे निकलती हैं रात को दिन का उजाला लेकरपाप क्या और पुण्य क्या वहां कोई तोल नहीं सकता ज़हर पीने वाली बना दी गईं पापी और हाथ झाड़ खड़ा होता है पुण्...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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वह जो आज अदृश्‍य हो गई

(1)वह आत्‍मा...ही तो है अकेली जो !निराकार..निर्लिप्‍त भाव से ही,प्रेम का अस्‍तित्‍व बताने को -अपने विशाल अदृश्‍य शून्‍य में...प्रवाहित करती रहती है आकार,निपट अकेली पड़ गई आज वो.. जिसने स्‍वयं को करक...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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भयमुक्त करने वाला ही बाजार में खड़ा है

आज शि‍वरात्रि है , शि‍व और शक्त‍ि के विवाह की तिथि, सभी शिवालय लोगों के हुजूम से भरे हुए रहे । आम दिनों में बिखरे पड़े रहने वाले बेलपत्रों की आज कीमत कई गुना बढ़ गई । कांवडि़यों के जत्थे शि‍वालय...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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प्रेम का ऐसा हठयोग ...?

आलता भरे पांव से वो ठेलती है,उन प्रभामयी रश्म‍ियों को, कि सूरज आने से पहले लेता हो आज्ञा उससेप्रेम का ऐसा हठयोग देखा है तुमने कभी कैसे पहचानोगे किकौन बेताल है,  और कौन विक्रमादित्य, जिसके कां...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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षडयंत्र तो भुनते हैं..

उसके पैर बंधे थे, उसके हाथ बांध दिये गये थे,सिर से पांव तक गहनों से ,जैसे ठोक दिया गया हो कीला किसी पत्‍थर मेंउसके तन को...नहीं, नहीं, मन पर भी चिपका दिया गया था कीलाइसीलिए वह मौन थी हजारों वर्षों स...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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पाइपलाइन में रिसाव ...

सुबह सुबह खबर मिली है कि...कभी शहर की तरक्‍की के लिए अंग्रेजों नेबिछाई थी जो पाइपलाइन पानी की-आज वो फटकर रिस रही है...खबर ये भी मिली है कि-पानी के रिसाव से फट रहे हैं ,मकान-दुकान-पुराने किले और दरी-द...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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अशब्‍दिता

नि:शब्‍द होना किसी का,अशब्‍द होना तो नहीं होताऔर अशब्‍द होते जाना, प्रेमविहीन होते जाने सेबहुत अलग होता है।मन की तरंगों पर डोलतेअनेक शब्‍द,ढूढ़ते हैं किनारे...पर...!कोई शब्‍द इन किनारों परअपना ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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छूट गये दर्ज़ होने से

हर्फ़ ब हर्फ़ जिंदगीउतरती गई पन्‍नों परऔर पन्‍नों के कोनों में दर्ज होती गईं हमारी खुश्‍बुएंहमारे झगड़े, हमारी मोहब्‍बतें,हमारा सूनापन, हमारे जज्‍़बात,हमारा गुस्‍सा, वो सबकुछ जो हमारे पास ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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किसके हस्‍ताक्षर हैं ये

वो आवाजें जो गूंजती हैं रातों कोबिछा देती हैं कुछ करवटें अपने अहं कीवो आंखें जो देती हैं सूरतों पर निशानवो  प्रेम के ही अस्‍तित्‍व की चिता बुनती हैंहिम्‍मतें भी जोर से उछलती हैं अंतर्मन में...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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उन्‍मुक्‍त वसन

उन्‍मुक्‍त वसन में प्रेम गहन,कुछ कम मिलता हैदेह धवल में काला मन अक्‍सर दिखता हैजो दिखे नहीं वही बीजअंकुर दे पाता हैतन जल जाता पर मन कोकौन जला पाता हैअभी और कितनी यात्रायें हमको करनी हैं यूं ही...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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तुम यहीं हो...

ये आहटें,ये खुश्‍बुएं,ये हवाओं का थम जाना,बता रहा  है कि तुम यहीं हो सखा,मेरे आसपास...नहीं नहीं...मेरे नहीं मेरी आत्‍मा के पासमन के बंधन से मुक्‍ततन के बंधन भी कब के हुए विलुप्‍त....छंद दर छंद पर तु...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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