पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

अधर

सुंदर हैं वो अधर, मेरे शब्दों में जो भरते हैं स्वर...ओ संगनिष्ठा, मेरे कोरे स्वर तू होठों पे बिठा,जब ये तेरे रंगरंजित अधरों का आलिंगन ले पाएंगे,अंबर के अतिरंजित रंग इन शब्दों मे भर जाएँगे!शब्दों ...  और पढ़ें
16 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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अधर

सुंदर हैं वो अधर, मेरे शब्दों में जो भरते हैं स्वर...ओ संगनिष्ठा, मेरे कोरे स्वर तू होठों पे बिठा,जब ये तेरे रंगरंजित अधरों का आलिंगन ले पाएंगे,अंबर के अतिरंजित रंग इन शब्दों मे भर जाएँगे!शब्दों ...  और पढ़ें
1 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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हलचल प्रभात

सुप्रभात....मेरी पसंदीदा प्रभात दर्शनस्थलhttp://halchalwith5links.blogspot.in/2017/08/762.html?m=1...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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भावस्निग्थ

कंपकपाया सा क्युँ है ये, भावस्निध सा मेरा मन?मन की ये उर्वर जमीं, थोड़ी रिक्त है कहीं न कहीं!सीचता हूँ मैं इसे, आँखों में भरकर नमीं,फिर चुभोता हूँ इनमें मैं, बीज भावों के कई,कि कभी तो लहलहाएगी, रिक्...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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अव्यक्त कहानी

रह गई अब अव्यक्त जो, हूँ वही इक कहानी मैं!आरम्भ नही था जिसका कोई,अन्त जिसकी कोई लिखी गई नहीं,कल्पना के कंठ में ही रुँधी रही,जिसे मैं  परित्यक्त भी कह सकता नहीं।चुभ रही है मन में जो, हूँ वही इक पी...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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15 अगस्त

ये है 15 अगस्त, स्वतंत्र जब हुआ ये राष्ट्र समस्त!ये है उत्सव, शांति की क्रांति का,है ये विजयोत्सव, विजय की जय-जयकार का,है ये राष्ट्रोत्सव, राष्ट्र की उद्धार का,यह 15 अगस्त है राष्ट्रपर्व का।याद आते ...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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मेरी जन्मभूमि

है ये स्वाभिमान की, जगमगाती सी मेरी जन्मभूमि...स्वतंत्र है अब ये आत्मा, आजाद है मेरा वतन,ना ही कोई जोर है, न बेवशी का कहीं पे चलन,मन में इक आश है,आँखों में बस पलते सपन,भले टाट के हों पैबंद, झूमता है आ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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है कहाँ?

है कहाँ अब वो दिन, है कहाँ अब वो बेकरारियाँ?चैन के वो दिन, अब हो चुके है ग्रास काल के,वक्त के ये अंधेरे निगल चुके हैं जिसे,ढूंढते है बस हम उन्हें, थामे चराग हाथ में।है कहाँ अब वो पल, है कहाँ अब वो तन्...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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अनुरोध

मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल....कूउउ-कूउउ करती तेरी मिश्री सी बोली,हवाओं में कंपण भरती जैसे स्वर की टोली,प्रकृति में प्रेमर॔ग घोलती जैसे ये रंगोली,मन में हूक उठाती कूउउ-कूउउ की ये आ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

शोर मचाती आँखें

शोर बहुत करती है तेरी चुप सी ये दो आँखें!जाने ये क्या बक-बक करती है तेरी ये दो आँखें!भींचकर शब्दों को भिगोती है ये पहले,दर्द की सुई फिर डूबकर पिरोती है इनमें,फिर छिड़ककर नमक हँसती है तेरी ये दो आँख...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

विदाई

विदाई की वेदना में असह्य से गुजरते हुए ये क्षण!भर आई हैं आखें, चरमराया सा है ये मन,भरी सी भीड़ में, तन्हा हो रहा ये बदन,तपिश ये कैसी, ले आई है वेदना की ये अगन!निर्झर से बह चले हैं, इन आँखों के कतरे,बोझ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

उम्र की दोपहरी

उम्र की दोपहरी, अब छूने लगी हलके से तन को...सुरमई सांझ सा धुँधलाता हुआ मंजर,तन को सहलाता हुआ ये समय का खंजर,पल पल उतरता हुआ ये यौवन का ज्वर,दबे कदमों यहीं कहीं, ऊम्र हौले से रही है गुजर।पड़ने लगी चेह...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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आसक्ति

आसक्त होकर निहारता हूँ मैं वो खुला सा आकाश!अनंत सीमाओं में स्वयं बंधी,अपनी ही अभिलाषाओं में रमी,पल-पल रूप अनंत बदलती,कभी निराशाओं के काले घनघोर घन,सन्नाटों में कभी घन की आहट,वायु सा कभी प्रतिप...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

चुप सी धड़कन

इस दिल में ही कहीं, इक धड़कन अब चुप सा रहता है!चुप सी अब रहने लगी है, इक शोख सी धड़कन!बेवजह ही ये कभी बेजार सा धड़कता था,भरी भीड़ में अब, तन्हा-तन्हा ये क्यूँ रहता है!अब तन्हाई में न जाने, ये किस से बातें क...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

समर्पण

वो पुष्प! संपूर्ण समर्पित होकर भी, शायद था वो कुछ अपूर्ण!अन्त: रमती थी उसमें निष्ठा की पराकाष्ठा,कभी स्वयं ईश के सर चढ कर इठलाता,या कभी गूँथकर धागों में पुष्पगु्च्छ बन इतराता,भीनी सी खुश्बु देक...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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कभी

कभी गुजरना तुम भी मन के उस कोने से,विलखता है ये पल-पल, तेरे हो के भी ना होने से...कुछ बीत चुके दिन सा है...तेरा मौजूदगी का अनथक एहसास!हकीकत ही हो तुम इक,मन को लेकिन ये कैसे हो विश्वास?कभी चुपके से आकर म...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

श्रापमुक्त

कुछ बूँदे! ... जाने क्या जादू कर गई थी?लहलहा उठी थी खुशी से फिर वो सूखी सी डाली....झेल रहा था वो तन श्रापित सा जीवन,अंग-अंग टूट कर बिखरे थे सूखी टहनी में ढलकर,तन से अपनों का भी छूटा था ऐतबार,हर तरफ थी टू...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

मन का इक कोना

मन का इक कोना, तुम बिन है आज भी सूना.....यूँ तो अब तन्हा बीत चुकी हैं सदियाँ,बहाने जी लेने के सौ, ढूँढ लिया है इस मन ने,फिर भी, क्युँ नही भरता मन का वो कोना?वो कोना चाहे तेरी ही यादों में खोना?मन का इक को...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हरी चूड़ियाँ

हाथों में चहकी हरीतिमा, ललचाए ये मन साजन के....हरी सी वो चूड़ियाँ, गाते हैं गीत सावन के,छन-छन करती वो चूड़ियाँ, कहते हैं कुछ हँस-हँस के,नादानी है ये उनकी या है वो गीत शरारत के?हाथों में चहकी हरीतिमा, लल...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

छलकते बूँद

ऋतु सावन की लेकर आई ये घटाएँ,बारिश की छलकी सी बूँदों से मन भरमाए,मंद-मंद चंचल सा वो बदरा मुस्काए!तन बूंदो से सराबोर, मन हो रहा विभोर,छलके है मद बादल से, मन जाए किस ओर,छुन-छुन छंदों संग, हिय ले रहा हि...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

रिमझिम सावन

आँगन है रिमझिम सावन, सपने आँखों में बहते से...बूदों की इन बौछारों में, मेरे सपने है भीगे से,भीगा ये मन का आँगन, हृदय के पथ हैं कुछ गीले से,कोई भीग रहा है मुझ बिन, कहीं पे हौले-हौले से....भीगी सी ये हरीत...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

विरह के पल

सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं.....आया था जीवन में वो जुगनू सी मुस्कान लिए,निहारती थी मैं उनको, नैनों में श्रृंगार लिए, खोई हैं पलको से नींदें, अब असह्य सा इन्तजार लिए,कलाई की चूरी भी मेरी,...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

उजड़ा हुआ पुल

यूँ तो बिसार ही चुके हो अब तुम मुझे!देख आया हूँ मैं भी वादों के वो उजरे से पुल,जर्जर सी हो चुकी इरादों के तिनके,टूट सी चुकी वो झूलती टहनियों सी शाखें,यूँ ही भूल जाना चाहता है अब मेरा ये मन भी तुझे!प...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

जीवन यज्ञ

इक अनवरत अनुष्ठान सा है यह जीवन का यज्ञ,पर, विधि विधान के फेरों में, है उलझी यह जीवन यज्ञ,कठिन तपस्या......!संपूर्णता की चाह में कठिन तपस्या कर ली मानव ने,पर, मनोयोग पाने से पहले.....पग-पग बाधाएँ कितनी ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

विखंडित मन

विखंडित ऐ मेरे मन! मैं तुझको कैसे समझाऊँ?हैं अपने ही वो जिनसे रूठा है तू,हुआ क्या जो खंड-खंड टूटकर बिखरा है तू,है उनकी ये नादानी जिनके हाथों टूटा है तू,माना कि टूटी है वीणा तेरे अन्तर की,अब मान भी ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

त्यजित

त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन में।क्षितिज की रक्तिम लावण्य में,निश्छल स्नेह लिए मन में,दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में,हर क्षण जला हूँ मैं अगन में...ज्युँ छाँव की चाह में, भटकता ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

रक्तधार

अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू,अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू.....चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को,मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई,सतत प्रयत्न कर भी पाप धर...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

खिलौना

तूने खेल लिया बहुत इस तन से,अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना?माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण,माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना।बहलाया मन को तूने इस तन से,जीर्ण खिलौने से अब, क्या ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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परखा हुआ सत्य

फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता?सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य,किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य,आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य!अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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ख्वाब जरा सा

कभी चुपके से बिन बोले तुम आना,इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना,वो राह जो आती है मेरे घर तक,उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना,उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा,तेरी पग से की होंगी जों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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