पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

वजह ढूंढ लें

जीने की कुछ तो वजह होगी,बेवजह ये सांसे न यूं ही चली होंगी,न सीने में दर्द यूं ही जगा होगा,ये आँसू न यूं ही आँखों मे भरा होगा,वजह कुछ न कुछ तो रहा होगा,वजह वही चलो हम ढूंढ लें.....नैन बेचैन रहते हैं क्य...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

गुनगुनाती पवन

है वजह कोई या यूं ही बेवजह!ओ रे सजन, गुनगुनाने लगी है फिर ये पवन....कुछ तुमने कहा!या कोई शिकायत हुई?सुनाने लगी है क्या ये पवन?कुछ गुनगुनाने लगी है क्यूं ये पवन?है कौन सा राग?या सोया कोई अनुराग,जगाने ...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

समय की आगोश में

समय बह चला था और मैं वहीं खड़ा था ......मैं न था समय की आगोश में,न फिक्र, न वचन और न ही कोई बंधन,खुद की अपनी ही इक दुनियां,बाधा विमुक्त स्वतंत्र उड़ने की चाह,लक्ष्य से अंजान इक दिशाविहीन उड़ान,समय को म...  और पढ़ें
7 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

जीवन्त पल

आदि है यही, इक यही है अन्त,संग गुजारे है जो पल, बस वही है जीवन्त!इक मृत शिला सा,मैं था पड़ा,राह के ठोकरों सा,मैं था गिरा,चंद आस्था के फूल लेकर,स्नेह स्पर्श देकर,जीवन्त तूने ही किया....संग बीते पल कई,स...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

लकीरें

मिटाए नहीं मिटती ये सायों सी लकीरें.......कहता इसे कोई तकदीर,कोई कहता ये बस है हाथों की लकीर,या गूंदकर हाथों पर,बिछाई है यहां बिसात किसी ने!यूं चाल कई चलती ये हाथों की लकीरें.......शतरंज जैसी बिसात ये,श...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

बिसारिए न मन से

इक याद हूं, बिसारिए न मन से,मुझको संभालिए जतन से,फिर लौट आऊंगा मैं उस गगन से,कभी पुकारिए न मन से!जब खुश्बू सी कोई आए चमन से,हो जाए बेचैन सी ये सांसें,या ठंढी सी बारिश गिरने लगे जब गगन से,बूंदों में ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

आलिंगन

अब उम्र हुई! अब है कहां वो आलिंगन?कभी इक तपिश थी बदन में,सबल थे ये मेरे कांधे,ऊंगलियों में थी मीठी सी चुभन,इक व्यग्रता थी,चंचलता थी चेहरे पर,गीत यूं ही बज उठते थे मन में,अंजाने से धुन पर थिरकते थे क...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

नीर थे वो

नीर थे वो, जो नैनों से छलककर बह गए.....जज्ब थे ये नैन की कटोरियों में,या हृदय की क्यारियों में,वर्षों तलक, अर्सों से यहीं...दफ्न थे ये सब्र की तिजोरियों में....कुछ विष भरे दंश देकर,मन में टीस के कुछ बीज ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

सधी हुई चाल

पग-पग गिनता हूं, फिर दो पग चलता हूं....संयम रखता हूं, धीरज धरता हूं,दो-दो पग तुलकर, इक पग मैं रखता हूं,बाधाओं से परे, मैं निर्बाध चलता हूं....पग-पग गिनता हूं, फिर दो पग चलता हूं....आवेग प्रबल, नियंत्रित कर...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

प्रणय फुहार

प्रणय की फुहार में, जब भी भीगा है ये मन .....सुकून सा कोई, मिला है हर मौसम,न ही गर्मी है, न ही झुलसती धूप,न ही हवाओं में, है कोई दहकती जलन...प्रणय की फुहार में, जब भी भीगा है ये मन .....कोई नर्म छाँव, लेकर आया ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कोरा अनुबंध

कैसी ये संविदा? कैसा यह कोरा अनुबंध?अनुबंधों से परे ये कैसा है बंधन!हर पल इक बंधन में रहता है ये मन!किन धागों से है बंधा ये बंधन!दो साँसों का अनबुझ सा ये अनुबंध!जज्बातों की इक जंजीर है कोई!या कोरे ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

दो पग साथ चले

दो पग पथ पर तुम क्या मेरे साथ चले......ख्वाब हजारों आकर मुझसे मिले,जागी आँखों में अब रात ढ़ले,संग तारों की बारात चले,सपनों में अब मन को आराम मिले!दो पग पथ पर तुम क्या मेरे साथ चले......कब दिन बीते जाने क...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

हम, हम में थे..

तुम जब-जब दो पग मेरे स॔ग थे...हम, हम में थे....हम! तुझ में ही खोए हम थे,जुदा न खुद से हम थे,तुम संग थे,तेरे पग की आहट मे थे,कुछ राहत मे थे,कुछ संशय में हम थे!कहीं तुम और किसी के तो न थे?तुम कहते थे....हम! बस सुन...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

प्रवाह

इक आह भरता हूं, किश्तों में प्रवाह लिखता हूं.....मैं अनन्त पथ गामी,घायल हूं पथ के कांटों से,पथ के कंटक चुनता हूं,पांवों के छालों संग,अनन्त पथ चल पड़ता हूं,राहों के कई अनुभव,मन में रख लेता हूं यूं सह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

कोई अन्त न हो

बासंती इन एहसासों का कोई अन्त न हो....मंद मलय जब छू जाती है तन को,थम जाती है दिल की धड़कन पलभर को,फिर इन कलियों का खिल जाना,फूलों की डाली का झूम-झूमकर लहराना,इन जज्बातों का कोई अन्त न हो.....यूं किरणों ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

कितने और बसंत

बांकी है हिस्से में, अभी कितने और बसंत....हो जब तक इस धरा पर तुम,यौवन है, बदली सी है, सावन है अनन्त,ना ही मेरा होना है अन्त,आएंगे हिस्से में मेरे,अनगिनत कितने ही ऐसे बसंत......शीतल, निर्झर सरिता सी तुम,ध...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

बाकि है बसंत

बाकि है हिस्से में मेरे, अभी कितने और बसंत....हो जब तक इस धरा पर तुम,यौवन है, बदली सी है, सावन है अनन्त,ना ही मेरा होना है अन्त,आएंगे हिस्से में मेरे,अनगिनत कितने ही ऐसे बसंत......शीतल, निर्झर सरिता सी त...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

पलकों तले रात

न जाने, क्या-क्या कहती जाती है ये रात....पलकों तले, तिलिस्म सी ढ़लती ये रात,धुंधली सी काली, गहराती ये रात,झुनझुन करती इतराती कुछ गाती ये रात,पलकों को, थपकाकर सुलाती ये रात!नींद में डबडब, बोझिल होती ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

आज का दौर

बस इक अंतहीन सी तलाश है हर किसी को....या हो महज ये दो जून की रोटी,या खुद का खोया वजूद,या कभी न मिटने वाली मानसिक भूख...इक अनबुझ सी प्यास,ये कभी न खत्म होने वाली तलाश,अध्यात्म से आत्म की ओरजीने की जीवट ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

यहीं सांझ तले

यहीं सांझ तले...कोई छाँव जरा सा, आ कहीं हम ढूंढ़ लें......दरख्त-दरख्त जब ठूंठ हो जाए,धूप दरख्तों से छनकर तन को छू जाए,आस बने जब इक सपना,भीड़ भरे जीवन में, कोई ना हो अपना,जब एकाकी सा ये दिन ढ़ले....यहीं सां...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

ललक

चुरा लाया हूं बीते हुए लम्हों से इक झलक!वही ललक, जो बांकी है अब तलक....कलकल से बहते किसी पल में,नर्म घास की चादर पर, कहीं यूं ही पड़े हुए,एकटक बादलों को निहारता मैं,वो घुमड़ते से बादल, जैसे फैला हों आ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

वृथा ये अभिमान

है वृथा का ये अभिमान.....हैं पल भर के यहाँ, हम सभी मेहमान!दो घड़ी का बस है ये जीवन,कब साँस टूटी, कब टूटा ये बंधन!क्यूं है इस सत्य से अन्जान?है मृदा से बना तू, न कर अभिमान ऐ इन्सान!है वृथा का ये अभिमान.....इ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

चराग

कई चराग बुझते रहे, पुरकशिश रात के साथ!यूं तो रौशनी भरते रहे, वो सारी रात,अंधेरों संग अकेले, लड़ते रहे वो सारी रात,तप्त तेल संग, तलते रहे अंग-अंग,पर, ये तंज अंधेरे, कसते रहे असह्य व्यंग,कालिख चराग की...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

प्रार्थना

मैं श्रद्धा सुमन कर रहा हूं अर्पण,नमन है मेरा, हे भगवन! है तुझको नमन!स्वीकार लेना ये मेरी प्रार्थना,निष्काम निष्कपट मेरी साधना,भूल कोई भी गर मैं करूं,तू ही बाँहें मेरी थामना,बस और कुछ भी, मैं तो च...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

क्या है ख्वाब ये

ये हकीकत है कोई, या है बस इक ख्वाब ये?इक धुंधलाती सी परछाईं,मद्धम सी गूंजती कोई मधुर आवाज,छुन-छुन पायलों की धुन,चूड़ियों की चनकती खनखनाहट,करीब से छूकर गुजरती कोई पवन,मदहोश करती वही खुश्बू...है ये ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

दर्द-ए-दयार

दर्द-ए-हजार, कोई दिले दयार रख गया...थी इक खुशी की मुझको तलाश,दर्द इक पल का भी, मुझको गँवारा न था,यूं ही आँखों से कोई बेकरार कर गया,बस ढ़ूंढ़ता ही रहा, मैं वो करार,दर्द का आलम, वो ही बेसुमार दे गया....दर्...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कहीं यूं ही

ऐ मेघ, कहीं किसी देश तू चलता चल यूं ही!जा सावन ले आ, जा पर्वत से टकरा,या बन जा घटा, नभ पर लहरा,तेरे चलने में ही तेरा यौवन है,यह यौवन तेरा कितना मनभावन है,निष्प्राणों में प्राण तू फूंक यूं ही......ऐ मेघ, क...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

झ॔झावात

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?जीवन के ये झंझावात,पल पल आँहों में, घिसते ये हालात,अन्तर्मन में पिसती कोई बात,धुन से भटकते ये साज.....ऐसे में मन को कोई छू जाए,दर्द दिलों के कम जाए,धुन ऐस...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

स्वार्थ

शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं....तेरी मोहक सी मुस्काहट में,अपने चाहत की आहट सुनता हूंतेरी अलसाए पलकों में,सलोने जीवन के सपने बुनता हूं,उलझता हूं गेसूओं में तेरे,बाहों में जब भी तेरे...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

कोलाहल

वो चुप था कितना, जीवन की इस कोलाहल में!सागर कितने ही, उसकी आँचल में,बादल कितने ही, उस कंटक से जंगल में,हैं बूंदे कितनी ही, उस काले बादल में,फिर क्यूं ये विचलन, ये संशय पल-पल में!वो चुप था कितना, शोर भ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7
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