पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

सहांश

हिस्से मे आए हैं मेरे कुछ बेचैन से पल,सहांश है ये मेरे...जो तुमने ही दिए थे कल.....परस्पर मुझ में ही कहीं ये पिरोए हैं हरपल,अनुस्यूत हो इस मन में कहीं,उलझे से धागों की, अन्तहीन सी लड़ी बनकर!सहरा में कि...  और पढ़ें
9 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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कत्ल

जीने की आरजू लिए, कत्ल ख्वाहिशों के करता हूँ....जिन्दा रहने की जिद में, खुद से जंग करता हूँलड़ता हूँ खुद से, रोज ही करता हूँ कत्ल....भड़क उठती बेवकूफ संवेदनाओं का,लहर सी उमड़ती वेदनाओं का,सुनहरी लड़ियों...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

अकेले प्रेम की कोशिश

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....कोशिशें बार-बार करता हूँ कि,रत्ती भर भी छू सकूँ अपने मन के आवेग को,जाल बुन सकूँ अनदेखे सपनों का,चून लूँ, मन में प्रस्फुटित होते सारे कमल,अर्थ दे ...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

संगतराश

जिंदादिल हूँ, कारीगर हूँ, हूँ मैं इक संगतराश...तराशता हूँ शब्दों की छेनी से दिल,बातों की वेणी में उलझाता हूं ये महफिल,कर लेना गौर, न करना यूँ आनाकानी,उड़ाना ना तुम यूँ मेरा उपहास,संगतराश हूँ अलबेल...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ.....जाने....कितने ही पलों का...उपांतसाक्षी हूँ मैं,बस सिर्फ....तुम ही तुमरहे हो हर पल में,परिदिग्ध हूँ मैं हर उस पल से,चाहूँ भी तो मैं ....खुद को...परित्यक्त नहीं कर सकता,बीते उस पल से।उपांतसा...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

व्यर्थ का अर्थ

शब्द ही जब विलीन हो रहे हों, तो अर्थ क्या?लुप्त होते रहे एक-एककर शब्द सारे,यूँ पन्नों से विलीन हुए, वो जीने के मेरे सहारे,शायद कमजोर हुई थी ये मेरी नजर,या शायद, शब्द ही कहीं रहे थे मुझसे मुकर....शब्द ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश....जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर,उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर,बह जाते हों, आँखो से पिघलकर,रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर.....सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनश...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

स्मरण

स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में ......मैं कहीं भी तो न था ....!न ही, तुम्हारे संग किसी सिक्त क्षण में,न ही, तुम्हारे रिक्त मन में,न ही, तुम्हारे उजाड़ से सूनेपन में,न ही, तुम्हारे व्यस्त जीव...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

मैं, बस मैं नहीं

मैं, बस इक मैं ही नहीं.....इक जीवन दर्पण हूँ.....!इक मैं, बस इक मैं ही नहीं.........इक रव हूँ, इक धुन हूँ,सहृदय हूँ, आलिंगन हूँ, इक स्पंदन हूँ,गीत हूँ, गीतों का सरगम हूँगूंजता हूँ हवाओं में,संगीत बन यादों में ब...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

24 बरस

दो युग बीत चुके, कुछ बीत चुके हम,फिर बहार वही, वापस ले आया ये मौसम....बीते है 24 बरस, बीत चुके है वो दिन,यूँ जैसे झपकी हों ये पलकें,मूँद गई हों ये आँखे, कुछ क्षण को,उभरी हों, कुछ सुलझी अनसुलझी तस्वीरें,व...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

अनन्त प्रणयिनी

कलकल सी वो निर्झरणी,चिर प्रेयसी, चिर अनुगामिणी,दुखहरनी, सुखदायिनी, भूगामिणी,मेरी अनन्त प्रणयिनी......छमछम सी वो नृत्यकला,चिर यौवन, चिर नवीन कला,मोह आवरण सा अन्तर्मन में रमी,मेरी अनन्त प्रणयिनी.......  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

अरुचिकर कथा

कोई अरुचिकर कथा,अंतस्थ पल रही मन की व्यथा,शब्दवाण तैयार सदा....वेदना के आस्वर,शब्दों में व्यथा की कथा?पर क्युँ कोई चुभते तीर छुए,क्युँ भाव विहीन बहे,श्रृंगार विहीन सी ये कथा,रोमांच विहीन, दिशाही...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

डोल गया मन

फिर क्या था, डोल गया, कुछ बोल गया ये मन.....उफक परसर रखकर इठलाई रवि किरण,झील में तैरते फाहों पर, आई रख कर चरण,आह, उस सौन्दर्य का क्या करुँ वर्णनपल भर कोमूँद गए मेरे मुग्ध नयन....फिर क्या था, डोल ग...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं.....व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी,चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी,देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी,वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी,सनैः सनैः बर्फ के फाहो...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हाँ मनुष्य हूँ

तुझे कितनी बार बताऊँ, हाँ मैं ही मनुष्य हूँ.....!मैं सर्वाहारी, स्तनपयी, होमो सेपियन्स हूँ!निएंडरथल नहीं, क्रोमैगनाॅन मानव हूँ,अमूर्त्त सोचने, ऊर्ध्व चलने, बातों में सक्षम हूँ,तात्विक प्रवीणताए...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

वही धुन

धुन सरगम की वही, चुन लाना फिर से तू यारा......वो पहला कदम, वो छम छम छम,इस दहलीज पर, रखे थे जब तूने कदम,इक संगीत थी गूंजी, गूंजा था आंगन,छम छम नृत्य कर उठा था ये मृत सा मन,वही प्रीत, वही स्पंदन, दे देना मुझक...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

खिलते पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश...चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल,परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश,या प्यार से कहता दरख्तेपल....दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से,फागुन सी होती ये पवन,होली ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कूक जरा पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा,तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..!छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू,कदाचित रहती नजरों से ओझल तू,तू रिझा बसंत को जरा,ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ?ऐ री प्यारी पपीहा,तू कूक जर...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

आज क्युँ?

आज क्युँ ?कुछ बिखरा-बिखरा सा लगता है,मन के अन्दर ही, कुछ उजड़ा-उजड़ा सा लगता है,बाहर चल रही, कुछ सनसन करती सर्द हवाएँ,मन के मौसम में,कुछ गर्म हवा सा शायद बहता है.......आज क्युँ ?कुछ खुद को समेट नहीं पाता ह...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

युग का जुआ

जतन से युग का जुआ, बस थामकर होगा उठाना....खींचकर प्रत्यंचा,यूँ धीर कर,साध लेना वो निशाना.....गर सिर्फ गर....!बिंब उस लक्ष्य की,इन आँखों में रची बसी,लगन की साध से,गर ये प्रत्यंचा रही कसी,धैर्य का दामन,छो...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा!इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान,कि है सबकी अपनी व्यथा,हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा,कौन पढे अब मेरी आत्मकथा?अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा!हश्र ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल...यादों के कितने ही लम्हे देकर,अनुभव के कितने ही किस्से कहकर,पल कितने ही अवसर के देकर,थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर,कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल...प्रगति क...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

मुख़्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात....सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे,देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से,इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे,सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों म...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा....न जाने वो कौन सा, जादू था भला,न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला,कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला,आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला।आईना था वही, बस बदला सा था अक्श म...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

माँ, बेटा और प्रश्न

माँ से फिर पूछता नन्हा "क्या हुआ फिर उसके बाद?"निरुत्तर माता, कुछ पल को चुप होती,मुस्कुराकुर फिर, नन्हे को गोद में भर लेती,चूमती, सहलाती, बातों से बहलाती,माँ से फिर पूछता नन्हा "क्या हुआ फिर उसके ब...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

750वीं रचना

स्व-अनुभवों की विवेचना है मेरी 750वीं रचना,रचनाओं की भीड़ में लिख रहा हूँ एक और रचना....नाम मात्र की नहीं ये रचना,पंख ले उड़ान भरती हुई है ये कोई संकल्पना,जन्म ले रही होती कोई कल्पना,स्व-अनुभवों की ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

रेत सा लम्हा

वक्त की झोली में, अनंत लम्हे हैं भरे,जीते जागते से, बिल्कुल हरे भरे...क्युँ न मांग लूं, वक्त से मैं भी एक लम्हा,चुपचाप क्युँ रहूँ मैं यहाँ तन्हा.....?होगा कोई तो लम्हा, मेरे भी नाम का,भीड़-भाड़ में, हो जो ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

आइए आ जाइए

आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए......हँसिए-हँसाइए, रूठीए मनाइए,गाँठ सब खोलकर, जरा सा मुस्कुराइए,गुदगुदाइए जरा खुद को भूल जाइए,भरसक यूँ ही कभी, मन को भी सहलाइए,जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए......आइए आ जाइ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

उन पहाड़ों को

उन पहाड़ों में कहीं, खुद को छोड़ आया था मैं....विशाल होकर भी कितनी शालीन,उम्रदराज होकर भी नित नवीन,एकांत में रहकर भी कितनी हसीन,मुखर मौन, भाव निरापद और संज्ञाहीन....उन पहाड़ों में कहीं, खुद को छोड़ आया थ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

ऋतुराज शिशिर

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई,संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई,जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई,ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी.....नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा,जीर्ण काया ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1
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