पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

नेपथ्य

मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशता नेपथ्य।जब मौन हो ये मंच, तो बोलता है नेपथ्य,यूँ टूटती है खामोशी, ज्यूँ खुल रहा हो रहस्य,गूँजती है इक आवाज, हुंकारता है सत्य,मौन के इस गर्भ में, है सत्य को तराशत...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

शरद हंसिनी

नील नभ पर वियावान में,है भटक रही.....क्यूँ एकाकिनी सी वो शरद हंसिनी?व्योम के वियावान में,स्वप्नसुंदरी सी शरद हंसिनी,संसृति के कण-कण में,दे रही इक मृदु स्पंदन,हैं चुप से ये हृदय,साँसों में संसृति क...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

कोलाहल

क्या सृष्टि के उस स्रष्टा की, है ये गगनभेदी हुंकार?काँप उठी ये वसुन्धरा,उठी है सागर में लहरें हजार,चूर-चूर से हुए हैं, गगनचुम्बी पर्वत के अहंकार,दुर्बल सा ये मानव,कर जोरे, रचयिता का कर रहा मौन पु...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

मौन अभ्यावेदन

मुखर मनःस्थिति, मनःश्रुधार, मौन अभ्यावेदन!ढूंढता है तू क्या ऐ मेरे व्याकुल मन?चपल हुए हैं क्यूँ, तेरे ये कंपकपाते से चरण!है मौन सा कैसा तेरा ये अभ्यावेदन?तू है निश्छल, तू है कितना निष्काम!जीवन ह...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

दुर्गे निशुम्भशुम्भहननी

अग्निज्वाला अनन्त अनन्ता अनेकवर्णा, पाटला,अनेकशस्त्रहस्ता अनेकास्त्रधारिणी अपर्णा,अप्रौढा,अभव्या अमेय अहंकारा एककन्या आद्य आर्या,इंद्री करली पाटलावती मन ज्ञाना कलामंजीरारंजिनी ।कात्...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार!मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार,झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर,किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार!हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई,नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई!कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल,ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल,झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल,डाली पे ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

प्रीत

मूक प्रीत की स्पष्ट हो रही है वाणी अब....अमिट प्रतिबिंम्ब इक जेहन में,अंकित सदियों से मन के आईने में,गुम हो चुकी थी वाणी जिसकी,आज अचानक फिर से लगी बोलनें।मुखर हुई वाणी उस बिंब की,स्पष्ट हो रही अब ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

निशिगंधा

घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा?निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ,अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें,बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें,महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा?प्रतीक्षा ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

छाए हैं दृग पर

छाए हैं अब दृग पर, वो अतुल मिलन के रम्य क्षण!वो मिल रहा पयोधर,आकुल हो पयोनिधि से क्षितिज पर,रमणीक क्षणप्रभा आ उभरी है इक लकीर बन।छाए हैं अब दृग पर, वो अतुल मिलन के रम्य क्षण!वो झुक रहा वारिधर,यु...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

दूभर जीवन

उस छोटी सी चिड़ियाँ का जीवन कितना दूभर?चातुर नजरों से देखती इधर-उधर,मन ही मन हो आतुर सोचती करती फिकर....मीलों होगे आज फिर उड़ने,अधूरे काम बहुत से होंगे करने,आबो-दाना है कहाँ न जाने?मिटेगी भूख न जान...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

निशा प्रहर में

क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में?रूको! अभी मत जाओ, तुम रुक ही जाओ इस आंगन में।बुझती साँसों सी संकुचित निशा प्रहर में,मिले थे भाग्य से, तुम उस भटकी सी दिशा प्रहर में,संजोये थे अरमान ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

नवव्याहिता

रिवाजों में घिरी, नव व्याहिता की बेसब्र सी वो घड़ी!उत्सुकता भड़ी, चहलकदमी करती बेसब्र सी वो परी!नव ड्योड़ी पर, उत्सुक सा वो हृदय!मानो ढूंढ़ती हो आँखें, जीवन का कोई आशय!प्रश्न कई अनुत्तरित, मन में क...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

झील

झील का अपना ही मन, जो आकर मिलती है मेरे मन से....कहते हैं कि झील का कोई समुंदर नही होता!मैं कहता हूँ कि झील सा सुन्दर कोई समुन्दर नही होता!अपनी ही स्थिरता, विराम, ठहराव है उस झील का,आभा अद्भुद, छटा नि...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

स्वमुल्यांकण

सब कुछ तो है यहाँ, मेरा नहीं कुछ भी मगर!ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर,बंद थी हथेलियों में कई चाहतें मगर!घुटन भरे इस माहौल में ऊँगलियां खुलती गईं,मरती गईं चाहतें, कुंठाएं जन्म लेती रहीं!यहा...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

मैं और मेरे दरमियाँ

ऐ जिन्दगी, इक तू ही तो है बस, मैं और मेरे दरमियाँ!खो सा गया हूँ मुझसे मैं, न जाने कहां!ढूंढता हूँ खुद को मैं, इस भीड़ में न जाने कहां?इक तू ही है बस और कुछ नहीं मेरा यहाँ!अब तू ही है बस मैं और मेरे दरमिय...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

भ्रम के शहर

हो न हो! भ्रम के इस शहर में कोई भ्रम मुझे भी हो?भ्रमित कर रही हो जब हवाएँ शहर की!दिग्गभ्रमित कर गई हों जब हवाएँ वहम की!निस्तेज हो चुकी जब ईश्वरीय आभाएँ!निश्छल सा ये मन फिर कैसे न भरमाए?हो न हो! भ्रम ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

आभार

"कविता जीवन कलश"https://purushottamjeevankalash.blogspot.comI am Surprised and Equally glad to see a huge TRAFFIC on my BLOG "कविता जीवन कलश". More than 950 (Exact 963) people viewed it on a single day on 25.08.2017. My heartiest Gratitude to All My Coveted Readers and Encouraging me with their Blessful Remarks on my BLOG   "कविता जीवन कलश" @ https://purushottamjeevankalash.blogspot.comThanks to My Worldwide Readers.......  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
12

जेहन में कहीं

ले रही है साँसें, मेरी यादें किसी के जेहन में कहीं....सहेजे रक्खा है किसी ने यादों में मुझे,सजदों में किसी ने फिर से पुकारा है मुझे,हम ही हम है उनकी राहों में कहीं,शायद उन आँखों मे है सिर्फ मेरी ही ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

भादो की उमस

दुरूह सा क्युँ हुआ है ये मौसम की कसक?सिर्फ नेह ही तो .....बरसाए थे उमरते गगन ने!स्नेह के....अनुकूल थे कितने ही ये मौसम!क्युँ तंज कसने लगी है अब ये उमस?दुरूह सा क्युँ हुआ....ये बदली का असह्य मौसम?प्रतिकू...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

कलपता सागर

हैं सब, बस उफनती सी उन लहरों के दीवाने,पर, कलपते सागर के हृदय की व्यथा शायद कोई ना जाने!पल-पल विलखती है वो ...सर पटक-पटक कर तट पर,शायद कहती है वो....अपने मन की पीड़ा बार-बार रो रो कर,लहर नहीं है ये....है ये अ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
13

अधर

सुंदर हैं वो अधर, मेरे शब्दों में जो भरते हैं स्वर...ओ संगनिष्ठा, मेरे कोरे स्वर तू होठों पे बिठा,जब ये तेरे रंगरंजित अधरों का आलिंगन ले पाएंगे,अंबर के अतिरंजित रंग इन शब्दों मे भर जाएँगे!शब्दों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

अधर

सुंदर हैं वो अधर, मेरे शब्दों में जो भरते हैं स्वर...ओ संगनिष्ठा, मेरे कोरे स्वर तू होठों पे बिठा,जब ये तेरे रंगरंजित अधरों का आलिंगन ले पाएंगे,अंबर के अतिरंजित रंग इन शब्दों मे भर जाएँगे!शब्दों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

हलचल प्रभात

सुप्रभात....मेरी पसंदीदा प्रभात दर्शनस्थलhttp://halchalwith5links.blogspot.in/2017/08/762.html?m=1...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

भावस्निग्थ

कंपकपाया सा क्युँ है ये, भावस्निध सा मेरा मन?मन की ये उर्वर जमीं, थोड़ी रिक्त है कहीं न कहीं!सीचता हूँ मैं इसे, आँखों में भरकर नमीं,फिर चुभोता हूँ इनमें मैं, बीज भावों के कई,कि कभी तो लहलहाएगी, रिक्...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

अव्यक्त कहानी

रह गई अब अव्यक्त जो, हूँ वही इक कहानी मैं!आरम्भ नही था जिसका कोई,अन्त जिसकी कोई लिखी गई नहीं,कल्पना के कंठ में ही रुँधी रही,जिसे मैं  परित्यक्त भी कह सकता नहीं।चुभ रही है मन में जो, हूँ वही इक पी...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

15 अगस्त

ये है 15 अगस्त, स्वतंत्र जब हुआ ये राष्ट्र समस्त!ये है उत्सव, शांति की क्रांति का,है ये विजयोत्सव, विजय की जय-जयकार का,है ये राष्ट्रोत्सव, राष्ट्र की उद्धार का,यह 15 अगस्त है राष्ट्रपर्व का।याद आते ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
18

मेरी जन्मभूमि

है ये स्वाभिमान की, जगमगाती सी मेरी जन्मभूमि...स्वतंत्र है अब ये आत्मा, आजाद है मेरा वतन,ना ही कोई जोर है, न बेवशी का कहीं पे चलन,मन में इक आश है,आँखों में बस पलते सपन,भले टाट के हों पैबंद, झूमता है आ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

है कहाँ?

है कहाँ अब वो दिन, है कहाँ अब वो बेकरारियाँ?चैन के वो दिन, अब हो चुके है ग्रास काल के,वक्त के ये अंधेरे निगल चुके हैं जिसे,ढूंढते है बस हम उन्हें, थामे चराग हाथ में।है कहाँ अब वो पल, है कहाँ अब वो तन्...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
13

अनुरोध

मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल....कूउउ-कूउउ करती तेरी मिश्री सी बोली,हवाओं में कंपण भरती जैसे स्वर की टोली,प्रकृति में प्रेमर॔ग घोलती जैसे ये रंगोली,मन में हूक उठाती कूउउ-कूउउ की ये आ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8
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