"एकलव्य" की पोस्ट्स

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

''वही पेड़ बिना पत्तों के''वही पेड़बिना पत्तों के झुरमुट सेझाँकता मन को मेरे भाँपताकल नहीं सोया था एक निद्रा शीतल भरी उनके स्मरणों को संजोता हुआशुष्क हो चलें हैं जीवन के विचार प...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
"एकलव्य"
3

''बेग़ैरत''

उस मील के पत्थर को सोचता चला जाता हूँ इस उम्र की दहलीज़ पर आकर फ़िसल जाता हूँ बस लिखता चला जाता हूँ ..... बस्ती हुई थी रौशन जब गुज़रे थे, इन गलियों से होकर कितना बेग़ैरत था, मैं अपनी ही खुद...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
"एकलव्य"
7

"कहीं मेरे कफ़न की चमक"

कुछ जलाये गए ,कुछ बुझाये गएकुछ काटे गए ,कुछ दफ़नाये गएमुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिलीमेरे अधूरे से नाम मिटाए गए एक वक़्त था ! मेरा नाम शुमार हुआ करता था चंद घड़ी के लिये ही सही ,  ख़ास -ओ -आम हुआ करता थ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
"एकलव्य"
3

"ख़ाली माटी की जमीं"

बदलते समाज में रिश्तों का मूल्य गिरता चला जा रहा है। बूढ़े माता-पिता बच्चों को बोझ  प्रतीत होने लगे हैं और हो भी क्यूँ न ? उनके किसी काम के जो नहीं रह गए ! हास् होती सम्बन्धों में संवेदनाये...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
7

"मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा"

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़राहवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बनालहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जलाजला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा                   ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
7

''पथ के रज''

गा रहीं हैं,सूनी सड़कें ओ ! पथिक तूँ लौट आ भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता नींद से ख़ुद को जगा प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे मिथ्या ही राजा बना चरणों की , तूँ धूल है  सत्य विस्मृत कर च...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
5

"न्याय की वेदी"

मैं प्रश्न पूछता अक़्सर !न्याय की वेदी पर चढ़कर !लज्ज़ा तनिक न तुझको हाथ रखे है !सिर पर मैं रंज सदैव ही करता,मानुष ! स्वयं हूँ,कहकर ! लाशों के ढेर पे बैठा बन ! निर्लज्ज़ तूँ ,मरघट स...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
4

"कालनिर्माता"

स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी य...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
7

"प्राणदायिनी"

वो दूध पिलाती माता !वो गले लगाती माता !कोमल चक्षु में अश्रु लेकर तुझे बुलाती माता !वो जग दिखलाती माता !तुझको बहलाती माता !तेरे सिर को हृदय लगाये ब्रह्माण्ड समेटे गाथा !रोती सड़...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
4

''विजय पताका''

वे शहद चटातें हैं !तुमको मैं नमक लगाता हूँ !तुमको वे स्वप्न दिखाते हैं !तुमको मैं झलक दिखाता हूँ !तुमको वे रंग लगातें हैं !तुमको मैं रक्त दिखाता हूँ !तुमको गर्दन पर चाकू मल...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
8

"मुक्ति मार्ग"

इस लोक मेंजन्मा !अज्ञानीकूट छिपामैंअभिमानी !सुन्दर तल हैं'कर'के मेरेजिनसे करता हूँनादानी !समय शेष हैअहम् कामेरेभ्रमित विचरता !माया वनमेंभ्रम रूपी मुझेहिरण दिखे हैस्वप्न दिवा कीबात कहे हैक...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
9

"मुर्दे !"

मैं हिला रहा हूँ लाशें !मैं जगा रहा हूँ आसें !उठ जा ! मुर्दे तूँ क़ब्र तोड़ के मैं बना रहा हूँ खाँचें !मैं हिला रहा हूँ लाशें !मैं जगा रहा हूँ आसें !मुर्दे तूँ झाँक ! क़ब्र से अपनी जिस...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
9

"जूतियाँ !"

प्रस्तुत 'रचना'उन पूँजीपतियों एवं धनाढ्य वर्ग के लोगों के प्रति एक 'आक्रोश'है जो देश के प्राकृतिक स्रोतों एवं सुख-सुविधाओं का ध्रुवीकरण करने में विश्वास रखते हैं। मेरी रचना का उद्देश्य  क...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
7

"देख ! वे आ रहें हैं''

पाए हिलनें लगे !सिंहासनों के,गड़गड़ाहट हो रहीकदमों से तेरे,देख ! वे आ रहें हैं........सौतन निद्रा जा रहीचक्षु से तेरे,हृदय में सुगबुगाहटहो रही,देख ! वे आ रहें हैं........भृकुटि तनी है ! तेरीकुछ पक रहा,आने ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
9

"चंद ख़्याल मेरे"

अब आ रहा है चैन क्यूँ जागूँ ? तूँ बता कल ही अभी सोया हूँ ख़लल डालूँ,तूँ बता !         ⧪बेच ही रहें हैं तो बेचने दे !आख़िर कफ़न उनका है मैयत भी उनकी !          ⧪वो नाचतें हैं,सिर पे !जाग ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
7

''कीर्ति स्तम्भ''

हिमालय के मैं गोद मेंथा सुषुप्त सा,रौद्र मेंहिम पिघलती जा रहीपीड़ा बन,आवेग मेंकोई पूछे ! क्यूँ पड़ा है ?मृत हुआ सा,सोच मेंदेख ! किरणें फूटतीं हैंघाटियों के मध्य मेंउठ ! खड़ा,तनकर यहाँउपदेश सा तूँ, र...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
10

"मत कर ! गर्व तूं इतना"

मत कर ! गर्व तूं इतनासंविधान भाव बनाया मैंने स्नेह से इसे सजाया मैंने संवेदनायें पल-पल पल्लवित होंगी स्वप्न तुझे दिखलाया मैंने। मत कर ! गर्व तूं इतना उड़ा विद्वेष था आसमान में प्रेम ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
12

"बुलबुला"

हृदय में उठता बुलबुला हताशाओं से, फट रहा लिख दूँ क्रांति ! लेखनी से मन ये मेरा कह रहालेकर मशालें हाथों में सुबहों निकलता नित्य हूँ जाग जा ! तूँ ऐ वतन काल तुझसे कह रहा लूटतें हैं ! भेड़...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
16

"अंतिम गंतव्य,बाक़ी"

                                                       "अंतिम गंतव्य,बाक़ी"स्वतंत्र भारत हो गया केवल स्मृतियाँ बाक़ी महान सागर,सूख चला मृत हुईं सीपियाँ बाक़ी। बन गईं ख...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
14

"भावनायें बनकर"

                                                                "भावनायें बनकर" गिर गईं भावनायें बनकर जो टिकीं, पलकों तले बहुत रोका हथेलियों से दबाकर स्याह बन गईं ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
14

एक सलाम 'अमर शहीदों'के नाम

                                                      एक सलाम 'अमर शहीदों'के नाम उगते सूर्य की किरणों जैसा दृढ़ निश्चय सा था वो आसमान में उड़ता खग था पृथ्वी पर जन्मा था...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
14

"आओ प्यारे"

                                                                                            "आओ प्यारे" प्यारी कविता 'देश'के नाम रहने दो!मंदिर,मस्ज़िद ,गुरुद...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
16

"गिर जायेंगे,ये ढेर बन"

                                                   "गिर जायेंगे,ये ढेर बन" "गिर जायेंगे,ये ढेर बन"इन आँसुओं से सींच दूँ मैं हो कोई सपना अगर थाम लूँ,मैं बाजुओं में हो कोई ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
15

"जाति-धर्म का ध्वज"'लेख'

                                                "जाति-धर्म का ध्वज"'लेख'  सर्वप्रथम मैं कहना चाहूँगा,हम मात्र इंसान हैं,न कि किसी विशेष धर्म-जाति के परिचायक।धर्म-जाति का ध...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
19

"हाँ,मैं मन हूँ"

                                                 "हाँ,मैं मन हूँ" "हाँ,मैं मन हूँ" हाँ मैं मन हूँ मानव का करतल हूँ आत्मा से द्वेष रखती चिरस्थाई महल हूँ हाँ,मैं मन हूँ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
17

"तैरतीं ख़्वाहिशें"भाग 'पाँच'

                                                   "तैरतीं ख़्वाहिशें"भाग 'पाँच'  "तैरतीं ख़्वाहिशें"आज़ मैं फिर सपनें देखता हूँ आज़ फिर,दिल को सेंकता हूँ आज़ फिर वही,मेरी म...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
21

"तैरतीं ख़्वाहिशें"भाग 'चार'

                                              "तैरतीं ख़्वाहिशें"भाग 'चार' "तैरतीं ख़्वाहिशें"कई रातें काटीं हैं,मैखानों में पीते-पीते मुक़्क़म्मल ज़िंदगी काट ली,ज़िंदगी जीते-जी...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
16

"डर लगता है आज भी"

                                                                                        "डर लगता है आज भी"  "डर लगता है आज भी" डर लगता है फिर वही,आँखें मूंदने स...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
14

"स्वतंत्रता के सही मायनें"'लेख'

 "स्वतंत्रता के सही मायनें"                                                                   "स्वतंत्रता के सही मायनें" 'लेख' तर्क!क्या हम स्वतंत्र हैं ?हमने स्वतं...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
16

"तूँ है एक अनुपम तस्वीर"

                                                    "तूँ है एक अनुपम तस्वीर" चिरस्थाई जीवन वटचिरस्थाई जीवन वट है शाखायें तेरी प्रबल धीर मानव मात्र की एक प्रेरणा बनकर ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
16
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